Thursday, February 2, 2023
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गंगा सेवा समिति और ब्रह्मराष्ट्र एकम द्वारा मकर संक्रांति पर किया गया अन्नदान महादान

 

सनातन धर्म मे मान्यता अनुसार मकर संक्रांति के पावन पर्व पर आज का दान एक ऐसा कार्य है, जिसके जरिए हम न केवल धर्म का ठीक-ठीक पालन कर पाते हैं बल्कि अपने जीवन की तमाम समस्याओं से भी निकल सकते हैं. आयु, रक्षा और सेहत के लिए तो दान को अचूक माना जाता है. जीवन की तमाम समस्याओं से निजात पाने के लिए भी दान का विशेष महत्व है. दान करने से ग्रहों की पीड़ा से भी मुक्ति पाना आसान हो जाता है।
जो व्यक्ति प्रतिदिन विधिपूर्वक अन्नदान करता है वह संसार के समस्त फल प्राप्त कर लेता है। अपनी सामर्थ्य एवं सुविधा के अनुसार कुछ न कुछ अन्नदान अवश्य करना चाहिए। इससे परम कल्याण की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से अन्न का दान जीवन में सम्मान का कारक होता है। अतः जरूरतमंदों को अन्न का दान करना चाहिएए अन्न दान से समस्त पापों की निवृत्ति होकर इस लोक और परलोक में सुख प्राप्त होता है।

अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुः।
स्कन्दपुराण के अनुसार अन्न ही ब्रह्मा है और सबके प्राण अन्न मे ही प्रतिष्ठित हैं।

अन्नं ब्रह्म इति प्रोक्तमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः
अतः स्पष्ट है कि अन्न ही जीवन का प्रमुख आधार है। इसलिए अन्नदान तो प्राणदान के समान है। अन्नदान को सर्वश्रेष्ठ एवं पुण्यदायक माना गया है। धर्म में अन्नदान के बिना कोई भी जप, तप या यज्ञ आदि पूर्ण नहीं होता है। अन्न एकमात्र ऐसी वस्तु है जिससे शरीर के साथ-साथ आत्मा भी तृप्त होती है। इसीलिए कहा गया है कि अगर कुछ दान करना ही है तो अन्नदान करो।
दान हमेशा अपनी इच्छा से करना चाहिए। किसी दबाव में किया गया दान कभी शुभ परिणाम नहीं देता।
महाभारत के अनुशासनपर्व* में बताया गया है कि जिस समय दुर्योधन, कर्ण और शकुनि ने छल से जुए में युधिष्ठिर के राज्य को छीन लिया और पांडव द्रौपदी के साथ वन को जा रहे थे, उस समय प्रजा व ब्राह्मण भी उनके साथ वन में जाने लगे। यह देखकर युधिष्ठिर को बहुत दु:ख हुआ और वे सोचने लगे कि वन में मैं इन सबका पेट कैसे भर सकूंगा। अपना पेट तो सब भर लेते हैं लेकिन उसी व्यक्ति का जीवन सफल है जो अपने कुटुम्ब, मित्र, अतिथि व ब्राह्मणों का पोषण कर सके। युधिष्ठिर ने उन ब्राह्मणों से कहा कि इस निर्जन वन में मुझे बारह वर्ष बिताने हैं अत: ऐसा कोई उपाय बताएं जिससे मेरे परिवार सहित आप लोगों के भोजन का प्रबन्ध हो सके।
साईं इतना दीजिये , जामे कुटुंब समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु ना भूखा जाय।
तब उन ब्राह्मणों में से *मैत्रेय मुनि* ने द्रौपदी के पूर्वजन्म की कथा सुनाते हुए युधिष्ठिर से कहा—‘लक्ष्मी रूपी द्रौपदी जहां रह रही हो वहां कोई भी चीज दुर्लभ नहीं है। द्रौपदी अपनी स्थाली (बटलोई, वह पात्र जिसमें भोजन बनाया जाता है) के अन्न से जगत को तृप्त कर सकती है।
दान के महिमा का अंत नहीं संसार मे कर्ण जैसा उदाहरण दानी के रूप में कोई नहीं।
दान के विषय मे एक कहावत स्पष्ट है-
कमाएं नीति से ,
खर्च करें रीति से ,
दान करें प्रीति से।

इसी बात को सत्य करते हुए सेवा भाव मे *गंगा सेवा समिति* और *ब्रह्मराष्ट्र एकम के सदस्य कोरोना महामारी के दौर से प्रारंभ हुई अस्सी घाट पे गरीबो और भूखों को निरंतर अन्नदान करते आ रहें हैं। जिसमें हर रोज़ गंगा आरती के बाद हज़ारों भूखों को भोजन कराया जाता है। माँ गंगा सेवा समिति की ओर से श्री बलराम मिश्र , श्रवण मिश्र,यश चतुर्वेदी, अभिषेक गोलू, विकास, सत्यम* और *ब्रह्मराष्ट्र एकम की ओर से भाई सचिन मिश्र (सनातनी) , प्रिया मिश्रा, कुशाग्र मिश्र, नृपेंद्र, संतोष, सुजीत और रजनी आदि* के सहयोग से अपनी सेवाएं निरंतर दे रहें हैं।

 

 

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