नई दिल्ली:
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भारत में अपेक्षाकृत कम उम्र के लोगों में हृदय रोगों के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे एक मूक महामारी करार दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक मानसिक तनाव, असंतुलित खानपान, शारीरिक निष्क्रियता और दिनचर्या में अनुशासन की कमी के कारण युवा वर्ग तेजी से दिल की बीमारियों की चपेट में आ रहा है।
29 सितंबर 2026 को विश्व हृदय दिवस पर आरजेएस पीबीएच -आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना द्वारा हर धड़कन जरुरी इसे नज़र अंदाज़ ना करें विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में आरजेएस टीम के मानद को-होस्ट स्वीटी पाॅल और नीति अरोड़ा ने पाॅजिटिव मीडिया परिवार की ओर से समाज में व्याप्त हृदय रोगों की वस्तु स्थिति पर ओपनिंग रिमार्क्स प्रस्तुत किए । उन्होंने कहा कि 29 सितंबर विश्व हृदय दिवस की शुरुआत 1999 में विश्व हृदय महासंघ (WHF) द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सहयोग से की गई थी।बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की वर्तमान जीवनशैली और उनमें कैसे सुधार किया जा सकता है,इसे लेकर अहम सवाल खड़े किए और चिंता जाहिर की।
तत्पश्चात मेडीकेयर न्यूज के संपादक स्वास्थ्य पत्रकार धनंजय कुमार ने तकनीकी सत्र का संचालन किया।
उन्होंने कहा कि यदि समय रहते जीवनशैली में सुधार किया जाए, शुरुआती लक्षणों की पहचान हो और नियमित चिकित्सीय जांच कराई जाए, तो किस तरह असमय होने वाले दिल के दौरों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नई दिल्ली के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ एच के चोपड़ा ने कहा कि दिनचर्या, आहार, विश्राम और व्यायाम में स्व-अनुशासन का पालन करना हृदय को स्वस्थ रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि अब बीस और तीस वर्ष के युवाओं में भी दिल के दौरे देखे जा रहे हैं। बचपन से ही अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है और तंत्रिका तंत्र पर अनुचित दबाव पड़ता है। बिना पूर्व चिकित्सकीय जांच के अचानक कठिन व्यायाम या खेलकूद में भाग लेने से कई बार अप्रत्याशित हृदय संबंधी समस्याएं उभर आती हैं। उन्होंने मांग की कि स्कूलों, कॉलेजों और कॉर्पोरेट संस्थानों में स्वस्थ हृदय पहल शुरू की जानी चाहिए ताकि कम उम्र से ही स्वास्थ्य के प्रति सजगता बनी रहे।
डॉ चोपड़ा ने सुझाव दिया कि बीस वर्ष की आयु से ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बुनियादी जांचें शुरू कर देनी चाहिए, जिनमें लिपिड प्रोफाइल, ब्लड शुगर, सीआरपी, किडनी फंक्शन और लिपोप्रोटीन (ए) शामिल हैं। चालीस वर्ष की आयु के बाद हर छह महीने में विस्तृत चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। उन्होंने इकोकार्डियोग्राफी को एक महत्वपूर्ण जांच बताया जिससे हृदय की मांसपेशियों की स्थिति, पंपिंग क्षमता और वाल्व की कार्यप्रणाली का सटीक आकलन होता है। इसके साथ ही उन्होंने उल्लेख किया कि आज भारत में हृदय रोग से जुड़े उन्नत उपचार, एंजियोप्लास्टी और वाल्व रिप्लेसमेंट तकनीकें पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कम खर्च में उपलब्ध हैं।
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ नरेश चावला ने कहा कि पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीय आबादी में हृदय रोग न केवल अधिक संख्या में होते हैं, बल्कि काफी कम उम्र में सामने आ रहे हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि देश में एक ओर कुपोषण की चुनौती है, तो दूसरी ओर मध्यम वर्ग में बढ़ता मोटापा, उच्च रक्तचाप और मधुमेह एक गंभीर संकट बन चुका है। डॉ चावला ने भोजन में नमक की अत्यधिक मात्रा पर अंकुश लगाने की आवश्यकता जताई और कहा कि दैनिक नमक की मात्रा तीन से चार ग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए। बाजार के तले-भुने और गरिष्ठ भोजन से परहेज करने तथा बुढ़ापे तक शारीरिक रूप से सक्रिय रहने को उन्होंने हृदय की सुरक्षा का मुख्य आधार बताया।
वरिष्ठ स्वास्थ्य पत्रकार धनंजय कुमार के संचालन में हुई इस चर्चा में स्वस्थ दिखने वाले युवाओं और प्रसिद्ध हस्तियों में अचानक होने वाली मौतों पर भी विचार-विमर्श हुआ। श्री कुमार ने सवाल उठाया कि बिना किसी स्पष्ट लक्षण के अचानक होने वाले दौरों से जनता में भय का माहौल बना है। इसके अलावा अस्पतालों और आम मरीजों के बीच विश्वास की कमी के कारण कई बार लोग सीने के दर्द को गैस या अपच समझकर घर पर ही समय गंवा देते हैं, जिससे गंभीर नुकसान होता है।
इस पर डॉ चावला ने चेतावनी दी कि दिल का दौरा पड़ने के शुरुआती एक से दो घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, जिसे ‘गोल्डन आवर’ कहा जाता है। सीने के मध्य में दर्द, भारीपन, पसीना आना अथवा दर्द का जबड़े या बाएं हाथ की ओर बढ़ना दिल के दौरे के स्पष्ट लक्षण हैं। ऐसे में एसिडिटी समझकर समय नष्ट करने के बजाय मरीज को तत्काल नजदीकी सक्षम अस्पताल ले जाना चाहिए।
अस्पतालों में जांच को लेकर उठने वाले संशयों पर डॉ चोपड़ा ने स्पष्ट किया कि एंजियोग्राफी जैसी प्रक्रियाओं की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग होती है और कानूनी तौर पर परिजनों को वस्तुस्थिति दिखाई जाती है। उन्होंने कहा कि यदि मरीज को बड़े अस्पताल ले जाने में समय लग रहा हो, तो आपातकालीन स्थिति में क्लॉट बस्टर इंजेक्शन देकर थक्के को घोलने का प्रयास किया जाता है ताकि एंजियोप्लास्टी के लिए आवश्यक समय मिल सके। प्राथमिक उपचार के तौर पर डॉक्टर की सलाह से एस्पिरिन, स्टेटिन और जीभ के नीचे रखी जाने वाली नाइट्रेट दवाओं का उपयोग सहायक सिद्ध हो सकता है।
परिचर्चा के दौरान मूक हृदय रोग (साइलेंट हार्ट अटैक) पर भी विस्तार से बात हुई। डॉ चोपड़ा ने बताया कि लंबे समय से मधुमेह से पीड़ित मरीजों में तंत्रिका संबंधी संवेदनशीलता कम होने के कारण सीने में तीव्र दर्द नहीं होता। ऐसे लोगों में अचानक अत्यधिक पसीना आना, चक्कर आना, कमजोरी या सांस फूलना ही प्रमुख लक्षण हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया की समस्या का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि रात में सोते समय सांस में रुकावट आने से मस्तिष्क और हृदय तक ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होती है, जिससे रक्तचाप बढ़ता है और दिल पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। स्लीप स्टडी के माध्यम से इस समस्या का निदान कर सीपैप या बाईपैप प्रणाली से इसका उपचार संभव है।
सत्र में भाग लेने वाले अन्य वक्ताओं ने भी कई व्यावहारिक प्रश्न रखे। स्वीटी पॉल ने युवाओं में काम के दबाव, अनियमित खानपान, सुबह का नाश्ता छोड़ने और अत्यधिक तनाव पर चिंता जताई। इसके जवाब में डॉ चोपड़ा ने कहा कि सात से आठ घंटे की नियमित नींद, संतुलित आहार और योग-ध्यान से मानसिक तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है।
नीति अरोड़ा के रक्तदान से जुड़े सवाल पर डॉ चोपड़ा ने स्पष्ट किया कि पर्याप्त मात्रा में जल ग्रहण करने और चिकित्सकीय मानकों का पालन करने के बाद किया गया स्वैच्छिक रक्तदान स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित है।
कार्यक्रम में उदय शंकर सिंह कुशवाहा, राजेन्द्र सिंह,निशा, डा.रश्मि चौबे,अमृता घई, विवेक कुमार सिंह,ओपी मदान, आकांक्षा, संजिता, मयंक राज , बृजानंद प्रसाद,आदि शामिल रहे।
उदय शंकर सिंह कुशवाहा ने सर्जरी के पश्चात डिहाइड्रेशन और प्रोटीन की कमी से शरीर में आने वाली सूजन और रक्त के थक्कों से जुड़े चिकित्सकीय पहलुओं पर जानकारी मांगी, जिस पर डॉ चोपड़ा ने प्रोटीन संतुलन बनाए रखने और समय पर जांच कराने की सलाह दी।
डॉ रश्मि चौबे ने ट्रेडमिल पर दौड़ते समय अचानक होने वाली दुर्घटनाओं के लक्षणों के बारे में पूछा, जिसके उत्तर में विशेषज्ञों ने अत्यधिक धड़कन बढ़ने, चक्कर आने या बेचैनी होने पर तुरंत जांच कराने की हिदायत दी।
हैदराबाद से जुड़े राजेंद्र सिंह कुशवाहा के प्रश्न पर डॉ चोपड़ा ने सिस्टोलिक और डायस्टोलिक रक्तचाप के अंतर को समझाया और सुबह-शाम रक्तचाप की निरंतर निगरानी की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही उन्होंने जिम में दी जाने वाली अनियंत्रित दवाओं, हार्मोनल इंजेक्शनों और अत्यधिक सप्लीमेंट्स के प्रति युवाओं को आगाह किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने बताया कि यह आयोजन संस्था की 660वीं कड़ी है। उन्होंने घोषणा की कि तीस सितंबर को नई दिल्ली स्थित इंडियन रेडक्रॉस सोसाइटी के राष्ट्रीय मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में एक विशेष स्वास्थ्य न्यूजलेटर जारी किया जाएगा, जिसमें परिचर्चा के मुख्य निष्कर्ष प्रकाशित होंगे। इसके साथ ही वहां स्वैच्छिक रक्तदान शिविर भी लगाया जाएगा। श्री मन्ना ने यह भी बताया कि आगामी दो अक्टूबर से शाकाहारी और संतुलित पोषण को बढ़ावा देने के लिए दो महीने का विशेष जनजागरूकता अभियान भी संचालित किया जाएगा।

