नई दिल्ली — विश्व महासागर दिवस 8 जून 2026 की पूर्व संध्या पर राम जानकी संस्थान पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस( आरजेएस पीबीएच) द्वारा संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना के संचालन में पर्यावरणीय क्षरण, अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानव मनोविज्ञान के अंतर्संबंधों पर गहराई से ध्यान केंद्रित किया
गया और संगोष्ठी से जो विमर्श उभर कर सामने आया, वह न केवल समुद्र के बढ़ते जलस्तर के बारे में , बल्कि मानव पारिस्थितिकी में उस मूलभूत व्यवधान के बारे में था जो अरबों लोगों को विस्थापित करने, अभूतपूर्व मानवीय संघर्ष को ट्रिगर करने और मानव-जनित सामूहिक विनाश की घटना को शुरू करने का संकट पैदा करता है।
प्रकृति व जीवन के कवि, और आयोजन के मुख्य वक्ता, अशोक कुमार मलिक ने वर्तमान पर्यावरणीय असंतुलन का एक गंभीर और विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत किया। बैठक में पूर्व मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, साहित्यकार ओम सापरा ,इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के पूर्व अधिकारी अली सादिक हुसैन और श्रीमती कमलेश ने अशोक कुमार मलिक का स्वागत व धन्यवाद किया।
अशोक कुमार मलिक ने कहा कि महासागर पृथ्वी की सतह के 71 प्रतिशत हिस्से को कवर करते हैं और जीवन के निर्विवाद पालने के रूप में कार्य करते हैं। मलिक ने वर्तमान पारिस्थितिक संकट के तार औद्योगिक क्रांति से जोड़े। उन्होंने तर्क दिया कि एक सदी से भी अधिक समय पहले दक्षिण-पश्चिम एशिया में जीवाश्म ईंधन की खोज और उसके आक्रामक दोहन को, हालांकि शुरुआत में एक आर्थिक वरदान के रूप में देखा गया था,
लेकिन इसने मानव विकास में एक घातक खामी को उजागर किया: दीर्घकालिक दूरदर्शिता की भारी कमी के साथ तकनीकी प्रतिभा की बहुतायत,इस अनियंत्रित दोहन के आर्थिक प्रभाव चौंका देने वाले हैं। आरजेएस पीबीएच पैनल ने चर्चा की कि कैसे ग्रीनहाउस गैसों, विशेष रूप से वाहनों के यातायात और थर्मल पावर स्टेशनों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड ने पृथ्वी के विकिरण बल को मौलिक रूप से बदल दिया है।
मलिक ने समझाया कि हालांकि प्राकृतिक ग्रीनहाउस- प्रभाव पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन मानवीय दूरदर्शिता की कमी और लालच ने वायुमंडल पर अत्यधिक कार्बनिक बोझ डाल दिया है, और यद्यपि महासागरों ने मानव की गतिविधियाें से उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसाें के परिणाम-स्वरूप निरंतर बढ़ते अधिकांश ताप काे साेखा है तथा कार्बन सिंक के रूप में कार्य किया है, लेकिन इसने ताप के सागरीय विपुल जलराशि मे पूर्णरूपेण मिश्रण की अत्यंत दीर्घ प्रक्रिया शुरू की है। आर्कटिक और हिमालय के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के साथ-साथ, महासागरों का तापीय विस्तार, समुद्र के जलस्तर में न केवल निरंतर वृद्धि कर रहा है, अपितु सागरीय विशाल जलधारायाें के वर्तमान प्राकृत संतुलन काे गंभीर रूप से अस्त-व्यस्त करेगा, जिन कारणाे से माैसम पर प्रभाव पड़ेगा और विशालतर चक्रवाताें, विकटतर बाढ़़ाें, सूखाें,सागरतटाें व द्वीपाें की जलमग्नता से मानव आबादी के विस्थापन-जनित त्रासदी से अकल्पनीय अस्तव्यस्ताओं के महासंकट का सामना करना पड़ेगा।
मलिक ने आगाह किया कि यदि समय रहते व्यक्तियाें द्वारा और वैश्विक स्तर पर सूझबूझ से साइंसदानाें द्वारा बताये रास्ते पर नहीं चला गया तो संकट गहरा होगा। उन्होंने यह जाेर देकर कहा कि मानव-समाज की पारिस्थितिकी काे धरती के प्राकृतिक पर्यावरण से तालमेल स्थापित करने का कोई विकल्प नहीं है़।

