Tuesday, September 1, 2026
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मंथली आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया न्यूज लेटर का लोकार्पण और राष्ट्रीय पोषण सप्ताह पर चर्चा

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह की पूर्व संध्या पर राम-जानकी संस्थान पाॅजिटिव ब्राॅडकास्टिंग हाउस (आरजेएस पीबीएच) द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय वेबिनार में संस्था के राष्ट्रीय ऑब्जर्वर दीप माथुर ने अतिथियों का स्वागत किया और कहा कि सोशल मीडिया पर चल रहे भ्रामक आहार प्रयोगों और सिंथेटिक प्रोटीन सप्लीमेंट्स के अंधाधुंध उपयोग के प्रति हमें सचेत रहने की जरूरत है। इस अवसर पर रिलीज आरजेएस के मंथली न्यूज लेटर को अनूठा बताया और कहा कि ये सकारात्मक आंदोलन की महीने भर की गतिविधियों का दस्तावेज है। कार्यक्रम में स्वीटी पॉल, नीति अरोड़ा ,डॉ मुन्नी कुमारी, उदय शंकर सिंह कुशवाहा, राजीव जायसवाल, अमृता घई ,डॉ रश्मि चौबे, मुकेश कुमार सिंह ,रुखसाना परवीन, चित्रदीप,महिमा जायसवाल ,सोमेश ,गिरीश चंद्र भद्री आदि शामिल हुए।
संस्था के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने कार्यक्रम का संयोजन व संचालन करते हुए लोगों से सकारात्मक सोच के साथ जो शरीर को साथ ले वैसा भोजन करना ही उपयुक्त है। आधुनिक जीवनशैली से पैदा हो रही गंभीर बीमारियों से बचाव का एकमात्र स्थाई उपाय आंतों के सूक्ष्मजीवों की सुरक्षा, संयमित दिनचर्या और संतुलित घरेलू आहार है।
आरजेएस पॉजिटिव मीडिया द्वारा डिस्कवर द पावर ऑफ न्यूट्रिशन विषय पर आयोजित 640वां विशेष विचार गोष्ठी को संबोधित करते हुए राजस्थान स्थित एमजी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस डॉ. ईशी खोसला ने बताया कि इसका मुख्य कारण हमारा बदला हुआ खाद्य तंत्र और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन है। खाद्य उद्योग द्वारा तैयार किए जा रहे कई उत्पादों में ऐसे तत्व मिलाए जाते हैं जो मस्तिष्क में कृत्रिम तलब पैदा करते हैं, जिससे भूख को नियंत्रित करने वाले प्राकृतिक हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि मानव शरीर का संपूर्ण स्वास्थ्य, पाचन, रोग प्रतिरोधक क्षमता, जीन की कार्यप्रणाली और मानसिक संतुलन आंतों में मौजूद माइक्रोबायोटा पर निर्भर करता है। तकनीकी सत्र में डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी संजय वर्मा ने स्वास्थ्य रक्षा के अर्न सिद्धांत को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि निरंतर व्यायाम, सकारात्मक सोच, समुचित विश्राम और संतुलित पोषण जीवन के मूल आधार हैं।वर्मा ने कहा कि मानव शरीर में एक जैविक घड़ी कार्य करती है, जिसे पर्याप्त नींद और विश्राम की आवश्यकता होती है। उन्होंने सफेद चीनी, अत्यधिक परिष्कृत नमक और चाय-कॉफी की लत से बचने का परामर्श दिया, क्योंकि ये भूख की प्राकृतिक अनुभूति को नष्ट करते हैं।पोल्ट्री फार्मों में एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक प्रयोग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बाजार से आने वाली सब्जियों को हल्के गुनगुने नमक के पानी में धोने और भोजन पकाने के पारंपरिक तरीकों को अपनाने का सुझाव दिया ताकि रासायनिक अवशेषों के प्रभाव को कम किया जा सके।
प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान आरजेएस के राष्ट्रीय प्रतिनिधि दीप माथुर ने पोषण की सही स्थिति को मापने के मापदंडों पर प्रश्न किया। इसके उत्तर में डॉ. खोसला ने बताया कि सुबह उठने पर ताजगी, मानसिक स्पष्टता, पेट का सुचारू संचालन और कमर का संतुलित घेरा व्यक्ति के सही पोषण के प्राथमिक संकेत हैं।

श्रोता स्वीटी पॉल द्वारा इंटरनेट पर प्रचलित डाइट वीडियो, भोजन की मात्रा और बच्चों की आदतों पर पूछे गए सवाल के जवाब में डॉ. खोसला ने कहा कि भोजन को तोलने की आवश्यकता नहीं है। भोजन करते समय अस्सी प्रतिशत पेट भरने पर रुक जाना चाहिए, क्योंकि तृप्ति का संदेश पंद्रह मिनट बाद मस्तिष्क तक पहुंचता है। उन्होंने सलाह दी कि बच्चों को प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से दूर करने के लिए घर में ही पौष्टिक, पारंपरिक और विविध राज्यों के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाएं।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के संयोजक उदय कुमार मन्ना ने बताया कि भारत सरकार के खाद्य एवं पोषण बोर्ड द्वारा 1982 में राष्ट्रीय पोषण सप्ताह की शुरुआत की गई थी, जिसका उद्देश्य नागरिकों को पोषण के प्रति जागरूक करना है।

कार्यक्रम के अंत में उदय मन्ना और दीप माथुर द्वारा संस्था के मासिक न्यूजलेटर का औपचारिक विमोचन किया गया। इस न्यूजलेटर में आजादी पर्व के अंतरराष्ट्रीय पखवाड़े, पुस्तक वितरण, लंदन और नेपाल से जुड़ी गतिविधियों और दिवंगत रंगकर्मियों को दी गई श्रद्धांजलि का विस्तृत संकलन किया गया है। डिजिटल माध्यम से जुड़े प्रतिभागी राजीव ने इस जन-जागरूकता अभियान की सराहना की, जबकि आयोजकों ने सकारात्मक संवाद और वैज्ञानिक स्वास्थ्य शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प दोहराया।
ईशी खोसला ने कहा कि देश में पोषण और स्वास्थ्य को लेकर जानकारी का अभाव नहीं है, फिर भी बीस से तीस वर्ष के युवाओं में हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, फैटी लिवर और थायरॉयड जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।
डा.खोसला ने स्पष्ट किया कि फसलों में हुए अत्यधिक आनुवंशिक बदलावों और आधुनिक हाइब्रिड अनाजों के लंबे उपयोग से आंतों की आंतरिक परत कमजोर हो रही है, जिससे शरीर में सूजन, पोषक तत्वों की कमी और ऑटो-इम्यून विकार पनप रहे हैं। डॉ. खोसला ने अपने क्लिनिकल अनुभवों का हवाला देते हुए बताया कि आहार में सही अनाज और पोषण का चयन करके गंभीर मानसिक तनाव, अवसाद और व्यवहार संबंधी विकारों को भी सफलतापूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है।

बाजार में बढ़ते प्रोटीन सप्लीमेंट्स के प्रचलन पर डॉ. खोसला ने कहा कि सामान्य व्यक्ति को प्रति किलोग्राम शरीर भार पर लगभग 0.8 से 1 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है, जबकि नियमित कसरत करने वालों के लिए 1.5 ग्राम तक पर्याप्त है। इसे दैनिक प्राकृतिक भोजन से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि डिब्बाबंद सिंथेटिक प्रोटीन और आइसोलेट्स शरीर में आंतरिक सूजन बढ़ाते हैं, कोलेस्ट्रॉल का स्तर बिगाड़ते हैं और अंगों पर अनावश्यक दबाव डालते हैं।

दैनिक जीवन के लिए डॉ. खोसला ने थ्री-पी का नियम प्रस्तुत किया। इसमें पहला पीक हंगर प्लानिंग है, जिसके तहत अगले दिन के खानपान की पूर्व योजना बनाई जाए ताकि शाम 4 से 7 बजे के बीच होने वाली अनियंत्रित भूख में जंक फूड से बचा जा सके। साथ ही अपनी शारीरिक अनुकूलता के अनुसार अनाज का चयन हो और सूर्यास्त के बाद भारी अनाज का सेवन न किया जाए। दूसरा प्रोटीन-फर्स्ट अप्रोच है, जिसमें दिन के कम से कम दो मुख्य भोजनों में दाल, पनीर या अन्य प्राकृतिक प्रोटीन को सब्जियों के साथ प्रमुखता दी जाए। तीसरा प्रोटेक्टिव फूड्स है, जिसके तहत कम से कम एक समय केवल फल, हरी सब्जियां, सलाद, सूप, फर्मेंटेड खाद्य पदार्थ, अच्छे वसा और पर्याप्त पानी का सेवन किया जाए, साथ ही शरीर के पुनर्निर्माण के लिए उपवास का सहारा लिया जाए।

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