Friday, January 9, 2026
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आरजेएस परिवार 25 दिसंबर को क्रिसमस पर और 28 दिसंबर को वीर बाल दिवस के उपलक्ष्य में कार्यक्रम करेगा

नई दिल्ली – ” “ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए” । राम जानकी संस्थान (आरजेएस) पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस द्वारा विश्व ध्यान दिवस 21 दिसंबर 2025 के अवसर पर “सदगुरु कबीर साहब के कर्म और भक्ति का संदेश” विषय पर आधारित इस कार्यक्रम में 15वीं शताब्दी के संत कबीर दास की शिक्षाओं को मानसिक मजबूती और सामाजिक समरसता के आधुनिक ब्लूप्रिंट के रूप में प्रस्तुत किया गया।
देवास मध्य कबीर लोक गायक दयाराम सारोलिया द्वारा को-ऑरगेनाइज कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सर्व धर्म समभाव की भावना का प्रचार प्रसार था और इसमें वो सफल रहे। टीआरडी26 , दिल्ली के ब्रदर दिनेश एलबर्टसन और टीआरडी26 मध्य प्रदेश के जगदीश मालवीय आगे आए और क्रिसमस और वीर बालक दिवस पर कार्यक्रम को-ऑरगेनाइज करने की घोषणा की।
आरजेएस पीबीएस-आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया के संस्थापक उदय कुमार मन्ना ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए योग और ध्यान के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, “योग मुद्राओं और श्वास नियंत्रण पर केंद्रित है, जबकि ध्यान मन, शरीर और आत्मा को जोड़ने का ‘महाविज्ञान’ है।” कबीर की साखियों से आंतरिक शक्ति और नया जीवन मिलता है। उन्होंने कबीर को ‘कर्मयोगी’ बताते हुए कहा कि वे केवल उपदेश नहीं देते थे, बल्कि स्वयं बुनकर के रूप में कर्म करते हुए आत्मनिर्भर भी थे।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और प्रसिद्ध कबीर लोक गायक पद्म श्री से सम्मानित प्रह्लाद सिंह टिपानिया ने अपने संबोधन में धार्मिक आडंबरों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि कबीर साहेब कहते हैं कि परमात्मा हमारे भीतर ही बसता है।” श्री टिपानिया ने ध्यान को एक ‘अंतर्यात्रा’ बताया और लोगों से जाति-पाति के संकीर्ण दायरे से ऊपर उठने का आह्वान किया। उन्होंने जोर देकर कहा, “कबीर वहां से शुरू होते हैं जहां हमारे मजहब और संप्रदाय की सीमाएं खत्म होती हैं।” उन्होंने लोगों से सकारात्मक आंदोलन को शब्दों से ज्यादा अंतरात्मा से अपनाने की सलाह दी।
मुख्य वक्ता और कार्यक्रम के सह-आयोजक दयाराम सारोलिया ने कबीर के कर्म सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि “कर्म ही सर्वोच्च भक्ति है” और आध्यात्मिक शांति के लिए व्यावसायिक आत्मनिर्भरता भी आवश्यक है। सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए टीआरडी26, देवास के सदस्य दीनोदय पत्रिका के संपादक दयाराम मालवीय ने कहा कि कार्यक्रम का मुख्य संदेश अपने भीतर के राम को पहचानें और ‘केवल सकारात्मकता’ के मार्ग पर चलें।
टीआरडी 26 दिल्ली के सदस्य ब्रदर दिनेश अलबर्टसन ने सर्वधर्म सद्भाव पर जोर देते हुए 25 दिसंबर को क्रिसमस डे पर आरजेएस का कार्यक्रम को-ऑरगेनाइज करने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मानव शरीर प्रकृति के पांच तत्वों से बना है और अंततः उसी मिट्टी में मिल जाता है, इसलिए मानवता ही सर्वोपरि है। उनकी धर्मपत्नी पेबम शकुंतला देवी भी टीआरडी26 में शामिल हैं।
सामाजिक जिम्मेदारी के पहलू पर प्रकाश डालते हुए मध्य प्रदेश टीआरडी26 जगदीश मालवीय ने 28 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ के अवसर पर “सर्दियों में स्वास्थ्य सुरक्षा” पर आरजेएस कार्यक्रम को-ऑरगेनाइज करने की जानकारी दी। टीआरडी26 राजेन्द्र सिंह कुशवाहा ने अंतिम समय में कबीर के मगहर जाने के ऐतिहासिक निर्णय का जिक्र किया। उन्होंने आरजेएस द्वारा किए जा रहे दस्तावेजीकरण के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सच्चा ज्ञान वही है जो दूसरों की सेवा में काम आए।
कार्यक्रम में ‘तीन पीढ़ियों की एकता’ का संदेश भी दिखा। सकारात्मक आंदोलन के संरक्षक युवा टोली पटना के साधक ओमप्रकाश ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को ध्यान के माध्यम से सिद्ध करने की बात कही। युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हुए लोक गायिका राजकुमारी सोलंकी और मुस्कान सोलंकी ने कबीर के भजनों की प्रस्तुति दी, जिसे ‘अमृतवाणी’ के रूप में सराहा गया।कबीर लोक गायक देवास के कमल मालवीय भी टीआरडी26 में शामिल हुए।

उदय कुमार मन्ना ने बताया कि 31 दिसंबर को इंडिया हैबिटेट सेंटर में आईएचसी के निदेशक और एमसीयू भोपाल के पूर्व कुलपति प्रोफेसर के.जी. सुरेश आरजेएस का ‘सक्सेस स्टोरी शो’ और आरजेएस का न्यूज लेटर लॉन्च करेंगे। वेबिनार का समापन इंदौर हाई कोर्ट के अधिवक्ता कुलदीप सारोलिया के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ, जिन्होंने अनुशासन और सकारात्मक सोच को हर पेशे की सफलता की कुंजी बताया।यह कार्यक्रम ‘पाॅजिटिव मीडिया भारत -उदय ग्लोबल मुवमेंट (पीएमभाऊजीएम)और ‘टीम रिपब्लिक डे 2026’ (टीआरडी 26) पहल का एक रणनीतिक हिस्सा था, जिसका उद्देश्य 2047 में भारत की स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है। आरजेएस के इस वेबिनार ने यह सिद्ध कर दिया कि कबीर की शिक्षाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। ‘कर्म’ और ‘भक्ति’ के समन्वय से ही एक आत्मनिर्भर और सकारात्मक भारत का निर्माण संभव है।

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