दिल्ली। राष्ट्रीय एकता दिवस पर 31 अक्टूबर 2026 को स्वास्थ्य के लिए शाकाहार और मानवता के लिए रक्त दान विषय पर राम-जानकी संस्थान पाॅजिटिव ब्राॅडकास्टिंग हाउस(आरजेएस पीबीएच)व आरजेएस पाज़िटिव मीडिया के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने 685वें कार्यक्रम का आयोजन और संचालन किया किया।
ओपनिंग रिमार्क्स में आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया के राष्ट्रीय ऑब्जर्वर दीप माथुर ने आरजेएस परिवार की ओर से सरदार पटेल की 151वीं जयंती 31 अक्टूबर व रेडक्रॉस के
संस्थापक हेनरी डूनंट की पुण्यतिथि 30 अक्टूबर के उपलक्ष्य श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि आनेवाले दिनों में शाकाहार आंदोलन और रक्तदान जागरूकता अभियान को तेज किया जाएगा। इस अवसर पर आरजेएस के मासिक न्यूज लेटर “पाॅजिटिव मीडिया” का विमोचन किया और कहा कि सकारात्मक आंदोलन के देश विदेश में आयोजित महीने भर की आरजेएस गतिविधियों को इसमें शामिल कर दस्तावेजीकरण किया जाता है।
एनडीएस, न्यू डायट सिस्टम के उचाना,जिंद हरियाणा शाखा प्रभारी दम्पति सतीश जांगड़ा और सुमन जांगड़ा ने कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने हाल ही में एनडीएस के संस्थापक बी वी चौहान की प्रेरणा से दिल्ली में 24 से 26 अक्टूबर को आयोजित एनडीएस हैल्थ कैंप पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि इंडियन रेडक्रॉस सोसायटी राष्ट्रीय मुख्यालय की संयुक्त सचिव और ब्लड सेंटर की प्रभारी डा.वनश्री सिंह ने भारत में हर साल करीब 15लाख यूनिट रक्त की कमी को दूर करने के लिए नागरिक संगठनों से जागरूकता अभियान तेज करने की अपील की । उन्होंने कहा कि आरजेएस परिवार के रक्त दान जागरूकता के संकल्प लेने के तीस दिन में आरजेएस के प्रचार से कुछ रक्तदान शिविर आयोजित करने में मदद मिली है,इसे और तेज करने की जरूरत है।देश में हर साल बुनियादी चिकित्सा जरूरतों को पूरा करने के लिए 1.5 करोड़ यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है जो अभी पूरा नहीं हो पा रहा है।। ये कहना था मुख्य अतिथि डॉ. वनश्री सिंह ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार किसी भी देश को अपनी कुल आबादी के कम से कम एक प्रतिशत के बराबर रक्त एकत्र करना चाहिए।
वेबिनार की अध्यक्षता कर रहे गुजरात के 80 वर्षीय पूर्व इंजीनियर तथा न्यू डाइट सिस्टम के संस्थापक बी.वी. चौहान ने उपवास, आंतों की सफाई और प्राकृतिक कच्चे आहार पर आधारित स्वास्थ्य दर्शन प्रस्तुत किया। पिछले 34 वर्षों से केवल कच्चे फलाहार पर जीवन व्यतीत कर रहे चौहान ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली से जुड़े अधिकांश रोग अप्राकृतिक भोजन, दूध व डेयरी उत्पादों के सेवन, पके हुए अनाज और शरीर में जमा गंदगी के कारण होते हैं।चौहान ने दैनिक जीवन के लिए तीन चरणों वाली सफाई पद्धति का विवरण दिया। इसमें सुबह उठते ही संजीवनी क्रिया यानी सादे पानी से एनिमा के जरिए बड़ी आंत की सफाई करना, उसके बाद लगातार आठ घंटे तक बिना अन्न-जल के पूर्ण उपवास रखना जिसे उन्होंने एयर फास्टिंग कहा, और उपवास तोड़ने पर आंवला, मोरिंगा, अनार के छिलके या करेले का डिटॉक्स जूस लेना शामिल है। इसके बाद दोपहर से रात तक मौसमी फल, कच्ची सब्जियां और जूस का सेवन करने तथा रात को सोने से पहले पुनः एनिमा करने का सुझाव दिया गया। उन्होंने पके हुए भोजन, पशुजन्य दूध, दालों, अनाज और नमक से परहेज करने की सलाह दी।
डॉ. वनश्री सिंह ने कहा कि जब अस्पतालों में रक्त की कमी होती है, तो इसका सबसे गंभीर असर थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों पर पड़ता है, जिन्हें हर पंद्रह दिन में रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है। इसके अलावा नियमित डायलिसिस कराने वाले मरीजों, कैंसर रोगियों और प्रसव के दौरान गंभीर जटिलताओं का सामना करने वाली महिलाओं को समय पर रक्त न मिलने से जीवन का संकट खड़ा हो जाता है। उन्होंने कहा कि स्वैच्छिक रक्तदान से ब्लड बैंकों में सुरक्षित भंडार तैयार होता है, जिससे ऐसे जरूरतमंद मरीजों की जान बचाई जा सकती है जिनके पास रक्तदान करने वाला कोई परिजन नहीं होता।
रक्तदान से जुड़ी भ्रांतियों का निवारण करते हुए डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि रक्तदान करने से शरीर में कोई कमजोरी या दर्द नहीं होता। स्वस्थ पुरुष प्रत्येक तीन महीने में और स्वस्थ महिलाएं प्रत्येक चार महीने में नियमित रक्तदान कर सकती हैं। अधिकृत ब्लड बैंक रक्तदाताओं को डोनर कार्ड उपलब्ध कराते हैं, जिसके आधार पर एक वर्ष के भीतर डोनर या उसके परिवार के किसी सदस्य को जरूरत पड़ने पर आसानी से रक्त उपलब्ध कराया जाता है। उन्होंने युवाओं और विद्यार्थियों में रक्तदान की आदत विकसित करने के लिए स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान बढ़ाने पर जोर दिया।
रेड क्रॉस के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए डॉ. वनश्री सिंह ने बताया कि स्विट्जरलैंड के व्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता हेनरी ड्यूनेंट ने उत्तरी इटली में सोलफेरिनो के युद्ध में घायल सैनिकों की दुर्दशा देखकर बिना किसी भेदभाव के प्राथमिक चिकित्सा सहायता शुरू की थी। ड्यूनेंट के प्रयासों से ही इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस की स्थापना हुई, जिनेवा कन्वेंशन बना और 1901 में उन्हें विश्व का पहला नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्होंने कहा कि मानवता की सेवा और निष्पक्षता का यही सिद्धांत स्वैच्छिक रक्तदान की भी मूल आत्मा है।
बी वी चौहान ने दैनिक जीवन के लिए तीन चरणों वाली सफाई पद्धति का विवरण दिया। इसमें सुबह उठते ही संजीवनी क्रिया यानी सादे पानी से एनिमा के जरिए बड़ी आंत की सफाई करना, उसके बाद लगातार आठ घंटे तक बिना अन्न-जल के पूर्ण उपवास रखना जिसे उन्होंने एयर फास्टिंग कहा, और उपवास तोड़ने पर आंवला, मोरिंगा, अनार के छिलके या करेले का डिटॉक्स जूस लेना शामिल है। इसके बाद दोपहर से रात तक मौसमी फल, कच्ची सब्जियां और जूस का सेवन करने तथा रात को सोने से पहले पुनः एनिमा करने का सुझाव दिया गया। उन्होंने पके हुए भोजन, पशुजन्य दूध, दालों, अनाज और नमक से परहेज करने की सलाह दी।
सत्र के दौरान उपस्थित प्रतिभागियों ने व्यावहारिक और चिकित्सीय पहलुओं पर कई सवाल पूछे। आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के राष्ट्रीय ऑब्जर्वर दीप माथुर ने सवाल उठाया कि लंबे समय तक पूरी तरह से प्लांट-बेस्ड और कच्चे आहार पर रहने से क्या शरीर में विटामिन बी12, हीमोग्लोबिन या आवश्यक प्रोटीन की कमी हो सकती है, और क्या पके भोजन के आदी लोगों को अचानक बदलाव करना चाहिए।
जवाब में बी.वी. चौहान ने कहा कि प्रकृति द्वारा निर्मित प्राकृतिक आहार में सभी आवश्यक तत्व मौजूद होते हैं और शरीर अपनी जरूरत के अनुसार पोषण का संतुलन बना लेता है। उन्होंने माना कि खानपान में अचानक बदलाव करने से शरीर पर दबाव पड़ सकता है, इसलिए धीरे-धीरे पके भोजन की मात्रा कम करते हुए कच्चे आहार की ओर बढ़ना चाहिए। बिहार के लखीसराय से जुड़े गोविंद कुमार द्वारा शरीर में गांठ की समस्या से पीड़ित 18 वर्षीय किशोरी के आहार के संबंध में पूछे गए सवाल पर चौहान ने बताया कि फल चबाकर खाना और ताजा जूस दोनों ही समान रूप से लाभकारी हैं। उन्होंने कहा कि जब तक पूरी तरह कच्चा आहार संभव न हो, तब तक थाली में 70 प्रतिशत उबली या हल्की पकी सब्जियां और बहुत कम अनाज लेना चाहिए।
लंदन से जुड़े कमलेश वाजिद ने गेहूं और चावल के विकल्प के रूप में बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाजों के उपयोग पर सवाल किया। चौहान ने स्पष्ट किया कि हालांकि मोटे अनाज गेहूं और चावल की तुलना में कम चिपचिपे होते हैं और कम नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन स्वास्थ्य की दृष्टि से कच्चा प्राकृतिक भोजन ही सर्वोत्तम है। वडोदरा के संदीप सोलंकी ने बताया कि जनवरी 2025 से इस पद्धति को अपनाकर उन्होंने अपना वजन घटाया और पथरी बाहर निकाली, लेकिन बाईं तरफ शरीर में दर्द बना रहता है। चौहान ने सुझाव दिया कि यह समस्या खानपान से जुड़ी होने के बजाय गलत मुद्रा या नस दबने के कारण हो सकती है, जिसकी जांच हड्डी या फिजियोथेरेपी के जानकारों से करानी चाहिए।
दिल्ली के अरविंद सिंह ने बताया कि दिल्ली और पंजाब के गुरुद्वारों में न्यू डाइट सिस्टम के शिविरों को भारी जनसमर्थन मिला है और दिसंबर के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में नए शिविर आयोजित किए जाएंगे। उचाना, जींद के सतीश जांगड़ा और सुमन जांगड़ा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि तीन साल पहले इस एनडीएस के प्राकृतिक जीवनशैली को अपनाकर सुमन ने घुटने के ऑपरेशन के बिना गंभीर जोड़ों के दर्द और कैल्शियम की कमी से पूरी तरह मुक्ति पाई।
आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने बताया कि इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी के साथ मिलकर शुरू किया गया स्वैच्छिक रक्तदान जागरूकता संकल्प 31 दिसंबर 2026 तक निरंतर चलेगा। इसके समापन पर नई दिल्ली के संसद मार्ग स्थित रेड क्रॉस राष्ट्रीय मुख्यालय में उत्कृष्ट सेवा देने वाले स्वयंसेवकों को प्रमाण पत्र प्रदान किए जाएंगे।
श्री मन्ना ने कहा कि 2047 तक चलने वाले आरजेएस संगठन के विस्तृत रोडमैप की जानकारी देते हुए बताया कि 7 से 26 जनवरी 2027 तक प्रवासी भारतीय दिवस और गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में 20 दिवसीय सतत जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त 12 से 14 फरवरी 2027 को नोएडा फिल्म सिटी स्थित मारवाह स्टूडियोज में एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन के अध्यक्ष डॉ. संदीप मारवाह की अध्यक्षता में आयोजित होने वाले 15वें ग्लोबल फेस्टिवल ऑफ जर्नलिज्म में आरजेएस परिवार करूणामयी पत्रकारिता से जागरूक भारत @2047 विषय पर कार्यक्रम करेगा जिसमें नेशनल वेज प्लेज का संकल्प लिया जाएगा।
उन्होंने बताया कि संगठन 2027 की शुरुआत में अपनी आठवीं पुस्तक, स्वतंत्रता दिवस 2027 पर नौवीं पुस्तक और 2028 के गणतंत्र दिवस तक 1,000 कार्यक्रम पूरे होने पर अपनी दसवीं पुस्तक प्रकाशित करेगा।

