Saturday, October 31, 2026
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हिंदी दिवस व गणेश उत्सव पर अंतरराष्ट्रीय आरजेएस संगोष्ठी: युवा पीढ़ी की भाषा शैली,नागरी लिपि और संस्कारों के संरक्षण पर मंथन

नई दिल्ली
हिंदी दिवस और गणेश चतुर्थी के अवसर पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी में भारत और ब्रिटेन के विद्वानों, शिक्षकों तथा प्रवासी भारतीय प्रतिनिधियों ने वर्तमान डिजिटल युग में नई पीढ़ी की भाषा शैली, नागरी लिपि के प्रयोग और सांस्कृतिक संस्कारों के संरक्षण पर विस्तृत विचार विमर्श किया।
आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के 649वें राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत आयोजित इस गोष्ठी का मुख्य विषय जेनजी और जेन अल्फा की भाषा शैली, संस्कार तथा राजभाषा हिंदी का महत्व रहा।
कार्यक्रम की को-होस्ट और संचालन कर रहीं साहित्यकार डॉ. रश्मि चौबे ने सोशल मीडिया पर हिंदी को रोमन के बजाय देवनागरी लिपि में लिखने का संकल्प लेने की अपील की। डा.रश्मिचौबे ने लघु कविताओं के माध्यम से संचालन में चार चांद लगा दिए।बारी -बारी से अतिथियों के संबोधन का उनके द्वारा दिए गए संक्षिप्त विवरण ने जेन जी और जेन अल्फा को प्रभावित किया।उन्होंने युवाओं से अपनी भाषाई संस्कृति को आत्मसात करते हुए भाषा की गरिमा बनाए रखने का आह्वान किया।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए संस्था के संस्थापक उदय कुमार मन्ना ने कहा कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसके ऐतिहासिक संदर्भों में व्यौहार राजेंद्र सिंह, काका कालेलकर और मैथिलीशरण गुप्त के संघर्षों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर हिंदी सामग्री की मांग निरंतर बढ़ रही है।

मुख्य अतिथि के रूप में नागरी लिपि परिषद के महामंत्री और आकाशवाणी के पूर्व अधिकारी डॉ. हरि सिंह पाल ने संविधान के अनुच्छेद 343(1) का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि हिंदी संघ की राजभाषा है, जबकि संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी 22 भाषाएं राष्ट्र की महत्वपूर्ण भाषाएं हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी देश की स्वाभाविक संपर्क भाषा है और देश के लगभग सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में इसमें उच्च स्तरीय शोध कार्य हो रहे हैं।

डॉ. पाल ने कहा कि जीवंत भाषा समय के साथ विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं के शब्दों को अपने भीतर समाहित करती है। हिंदी ने भी इतिहास में फारसी, अरबी, तुर्की, पुर्तगाली और अंग्रेजी के शब्दों को उदारता से अपनाया है। उन्होंने वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा विभिन्न विषयों में निर्मित हिंदी पारिभाषिक शब्दावली का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान-विज्ञान और प्रशासन के हर क्षेत्र में हिंदी सक्षम हो चुकी है, आवश्यकता केवल इसके व्यावहारिक उपयोग को बढ़ाने की है।

ब्रिटेन से जुड़ीं इंस्पायरिंग इंडियन वुमेन, यूनाइटेड किंगडम- भारत की संस्थापक निदेशक रश्मि मिश्रा ने बताया कि विदेशों में प्रवासी भारतीय समुदाय अपनी भाषाई पहचान के प्रति जागरूक है। विदेशी लहजे के बावजूद प्रवासी युवा और बच्चे हिंदी प्रतियोगिताओं और कविताओं में रुचि लेकर अपनी भाषा से जुड़े रहने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

यूनाइटेड किंगडम से कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं गुरुकुल यूके की संस्थापक निदेशक एवं भारतीय विद्या भवन की शिक्षिका डॉ. इंदु बरोट ने प्रवासी भारतीयों और स्वदेश की भाषिक प्राथमिकताओं पर तुलनात्मक दृष्टिकोण रखा। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हिंदी परीक्षा विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत डॉ. बरोट ने बताया कि विदेश में बसे भारतीय परिवार अपने बच्चों को भारतीय जड़ों से जोड़ने के लिए हिंदी और संस्कृत की कक्षाओं में भेजते हैं।

डॉ. बरोट ने कहा कि प्रवासी बच्चे जब भारत भ्रमण पर जाते हैं तो वे वहां के शहरी बच्चों को केवल अंग्रेजी में बात करते देख हैरान होते हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ नई पीढ़ी की भाषा में संक्षिप्त रूप और अंग्रेजी शब्दावली का आना स्वाभाविक है, लेकिन भाषा केवल संवाद का साधन नहीं बल्कि संस्कारों की वाहक भी है। यदि बच्चे पारिवारिक रिश्तों में संबोधन और शिष्टाचार को भूल जाएंगे तो संवाद की आत्मीयता समाप्त हो जाएगी। उन्होंने जोर दिया कि नई पीढ़ी से संवाद साधने के लिए हिंदी को आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया माध्यमों तक सशक्त रूप से पहुंचाना होगा।
युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में राजा महेंद्र प्रताप विश्वविद्यालय, अलीगढ़ की छात्रा नेहश्री वशिष्ठ ने सरस्वती वंदना की प्रस्तुति के साथ विचार रखे। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और वैश्विक सोच को अपनाते हुए भी युवाओं को अपनी भाषाई संस्कृति और मातृभाषा का सम्मान बनाए रखना चाहिए। वहीं लखनऊ से आठवीं कक्षा की छात्रा स्वरा त्रिपाठी ने गणेश वंदना के साथ लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा शुरू किए गए सार्वजनिक गणेशोत्सव के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला।
नोएडा स्थित डीडीएन पीआर एंड इवेंट्स स्टूडियो , नोएडा के प्रमुख प्रखर वार्ष्णेय ने आरजेएस के साथ अपने ग्यारह वर्षों के अनुभव साझा किए और रचनात्मक मीडिया विमर्श को आगे बढ़ाने की बात कही। कार्यक्रम में शामिल लोगों में थे—
सुनील कुमार सिंह , साधक डा.ओमप्रकाश, बिन्दा मन्ना,आरएस कुशवाहा,स्वीटी पॉल, प्रखर वार्ष्णेय, निशांत यादव, मोनिका नंदलाल,मयंक,डॉ रतिराम गढ़वाल, डा. शाहनवाज, आकांक्षा, प्राणेंद्रनाथ मिश्रा और सोनू कुमार

गोष्ठी के प्रश्नोत्तरी सत्र में समकालीन भाषिक चुनौतियों पर तीखी चर्चा हुई। प्रतिभागी इसहाक खान द्वारा सोशल मीडिया पर शब्दों के स्थान पर इमोजी के बढ़ते प्रयोग से शब्दावली दबने की चिंता जताए जाने पर डॉ. पाल ने कहा कि मानव समाज सदैव संक्षिप्त अभिव्यक्ति की ओर बढ़ता रहा है। इमोजी केवल तात्कालिक भाव संप्रेषण का माध्यम हैं, वे कहानी, कविता और विस्तृत लेखन का विकल्प नहीं बन सकते।

संरक्षक व लेखक प्राणेंद्र नाथ मिश्र ने सोशल मीडिया, मीम्स और आम बोलचाल में बढ़ती अभद्रता और अश्लील शब्दावली पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने सवाल किया कि भाषा की मर्यादा को विकृत होने से कैसे रोका जाए ताकि भाषा रूपी गंगा मैली न हो।
इसके उत्तर में डॉ. पाल ने कहा कि किसी भाषा के एकाध पक्ष की विकृति के आधार पर पूरी भाषा का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि आज का हिंदी साहित्य पहले की तुलना में अधिक समृद्ध और समावेशी हुआ है, जिसमें दलित, आदिवासी, स्त्री और प्रवासी विमर्श जैसे नए आयाम मजबूती से उभरे हैं। उन्होंने कहा कि भाषा का दायरा विस्तृत हुआ है और उसमें लचीलापन होना उसके जीवित होने का प्रमाण है।

हैदराबाद से जुड़े प्रतिभागी आर. एस. कुशवाहा द्वारा हिंदी और नागरी के अंतर पर पूछे गए प्रश्न को स्पष्ट करते हुए डॉ. पाल और कार्यक्रम संचालिका डॉ. रश्मि चौबे ने बताया कि हिंदी भाषा है और देवनागरी अथवा नागरी वह लिपि है जिसमें हिंदी सहित कई भारतीय भाषाएं लिखी जाती हैं।
अंत में उदय मन्ना ने सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद करते हुए बताया कि इस परिचर्चा के विचार आगामी प्रकाशनों और डिजिटल माध्यमों के जरिए जनसामान्य तक पहुंचाए जाएंगे।

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